anandpur satsang

Tuesday, February 21, 2006

सत्संग

श्री सत गुरु देवाय नम:
श्री सत गुरु जी तेरी ओट

अध्यात्मिक-यात्रा
हम सब प्राणी इस संसार रुपी भव सागर में यात्रा कर रहे है! और सभी यात्री चाहते है कि उनकी यात्रा सफलता पूर्वक पूर्ण हो! सागर में सफल यात्रा के लिए निम्नलिखित तीन बातो की आवश्यकता होती है।
1अनुकूल वायु 2 नाव 3 क़ुशल मल्लाह
1परमेश्वर की कृपा ही अनुकूल वायु है। 2 परमेश्वर का नाम ही नाव है।

3 सदगुरु ही कुशल मल्लाह है।
बिन सत्संग विवेक न होई,राम कृपा बिन सुलभ न सोई।
राम की सबसे बड़ी कृपा सदगुरु की ही प्राप्ति समझनी चाहिए। सदगुरु ही ईश्वर का नाम प्रदान करते है और कुशल मल्लाह की तरह भवसागर से पार ले जाते है।
सदगुरु पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए और उनके आदेशानुसार नामजप नियमपूर्वक करना चाहिए।

नियम से नामजप करने से जगत का आर्कषण कम होकर मन ईश्वर में रम जाएगा। सुरती पिण्ड देश ( मायिक क्षेत्र) से उठकर उच्च सोपानों पर पहुचँकर दिव्य आनन्द का रसपान करेगी। इस समय माया बहुत से प्रलोभन दिखाती है इसलिए साधक को बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। सदगुरु का शिष्य अपने पुरुषार्थ को प्रमुखता न देकर अपने गुरु की कृपा को ही प्रमुखता देता है। जिससे वह कर्तापन के दोष से बचा रहता है।भक्तिमार्ग में अहंकार साधक का सबसे बड़ा शत्रु है। भगवान श्री राम ने अपने सेवको का अभिमान लव-कुश से तुड़वाया और भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन का गर्व भीलो से खंडित करवाया था। ऐसे ही सदगुरु के मार्गदर्शन मे साधना करने का विशेष लाभ यह होता है कि सदगुरु अपने सेवको को भक्ति का खजाना भी बख्शते है और अहंकार आदि शत्रुओं से सेवकों की रक्षा भी करते है।



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